بدھ، 7 جنوری، 2026

दलीले नबूवत स.अज़मते हसन अ. व ह़श्रे मख़्फ़ी शख़्स !

दलीले नबूवत स.अज़मते हसन अ.व ह़श्र ए मख़्फ़ी शख़्स !

दो सौ,ख़ास तौर से सत्तर अस्सी 70-80 साल से ऐसे काम किए जा रहे हैं जो बारह तेरह 12-13 सौ साल में उम्मत मॊहम्मदिया ने कभी नहीं किए।मिल्लत ए इस्लामिया ने इस पूरे दौर में कभी भी बच्चों के नाम सुफयान ओ हिंदा,मुआविया ओ यज़ीद,मर्वान ओ सफ़्वान, हज्जाज ओ ज़ियाद वग़ैरह नहीं रखे।कम अज़ कम बर्र ए स़ग़ीर की हज़ार 1000/1200 बारह सो साला तारीख़ में तो क़त़्अन नहीं।अब पेट्रो-डॉलर कै नर्ग़े में फंसके सुफयान ओ मुआविया,हिंदा ओ यज़ीद, मर्वान ओ सफ़्वान आम किए जा रहे हैं और ह़जाज के लिए दलों में नर्मी पैदा की जा रही है।कहीं सियासत ए मुआविया ज़िंदाबाद के नारे लगाए,उर्स मनाए तो कहीं से '' यज़ीद  मुआविया का बेटा था, इस लिए 'ताबेई' था, इसके लिए उसे 'रहमहुल्लाह' कहना चाहिए '' के फत्वे जारी किए जा रहे हैं।इसी तरह और भी बिल्कुल नए नए काम किए जा रहे हैं,जो इस्लाम और उसकी त़ाहिर ओ मुत़्त़हर हस्तियों की शबीह बिगाड़ने के साथ साथ मुसलमानों के ज़ाविया ए निगाह तब्दील कर रहे हैं,बल्कि ज़ेहनियत,ईमान ओ अक़ाइद,ऐमाल ओ अक़्वाल ओ ख़स़्लतों में भी ख़तरनाक बदलाव ला रहे हैं, उधर क़ाबिल ए कराहत लोगों को क़ाबिल मदह़ बना रहे हैं।उम्मत में ऐसे लोग पैदा कर दिए गए हैं जो ह़क़ के नाम पे सना ए बात़िल और बनाम ए एह़तराम ए कुल, मुस़ाबहत ए आप स., शान ए अहल ए  बैत ए अत़्हार अ., स़ह़ाबियत ए साबिकून अव्वलून मुहाजिर ओ अंसार रज़ि., इत्तिबा ए ताबेईन ओ तबे ताबेईन और तक़्वा ए औलिया अल्लाह व स़ुलह़ा रहो., की तज़्ह़ीक ओ तज़्लील करने पे कमर बांध चुके है। फ़िर्क़ा हाए जदीद में से बाज़ मस्लकों ने अपने क़दीम अक़ाइद ओ नज़रयात को इस ताल्लुक़ से पस ए पुश्त डाल दिया है और बिल्कुल नए अक़ीदे व नज़रिए अपना लिए हैं।बेश्तर मुक़र्रिर,वाइज़, ख़त़ीब, मुसन्निफ़ ओ मुबल्लिग़ अहल ए बैत ए अत़्हार अ. से  बरा ए नाम ताल्लुक़ के ख़ूगर हो गए या उनके अस्मा ए मुबारिका का इस्तेमाल अवाम की अक्सिरयत के दरम्यान अपनी साख बचाए रखने के लिए कर रहे हैं।साबिक़ून अव्वलून मुहाजिर ओ अंसार सहाबा रज़ि. के हम पल्ला मुआविया को बाव़र कराया जा रहा है,बल्कि बाज़ औक़ात उनसे भी बढ़के,जैसे यज़ीद को मुआविया का बेटा होने की बिना पे " ताबेई " और "रहमहुल्ला" डिक्लेयर किया गया, हालांकि आप स. के फ़र्मान के तहत मुआविया ख़ुद #त़ुलक़ा में है.....! जिसका मतलब बशुमूल हज़रत इमाम हुसैन अ., अस़्ह़ाब ए रसूल स. और ह़ुक़म ए क़ुरआन के मुताबिक़ उनकी एह़सान के साथ पैरवी करने वालों का दानिस्ता ना-दानिस्ता मज़ाक उड़ाया जाए,और मुआविया ओ यज़ीद को उनके सरों पे बिठा दिया जाए, ज़मीर, शराफ़त ओ अक़्दार ओ अख़्लाक़ की बात ही क्या!अदालत, क़वानीन ए शरीयत,इंसाफ़,उ़स़ूल ओ ज़वाबित़ समेत इस्लाम को दफन कर दिया जाए और इस्लाम के नाम पे ही मुसलमानों को दीन ए खुदा ओ रसूल स۔से निकाल के बेराह रवी पे डाल दिया जाए,रोज़ मर्रा की पूरी ज़िंदगी बा-उस़ूल से बेउस़ूल, इंसाफ़ पर्वरी से ना-इंस़ाफ़ी और ह़क़ से हटा के बातिल पे मुर्तकिज़ कर दी जाए,यहां तक कि उनकी आख़िरत बिलख़ैर पे भी स़वालिया निशान लगा दिया जाए।मिल्लत में एक बिल्कुल मुंफ़रिद त़़बक़ा उभर आया है जो 50-100 साल पहले तक कहीं नहीं था और बनू उमय्या के लिए ख़ुदा ओ रसूल स.,इस्लाम ओ ईमान, उस़ूल ओ मबादी,निज़ाम ए अद्ल और उम्मत ए मॊहम्मदिया को दाऊ पे लगा चुका है।त़़वील गुफ़्त्गू का मौक़ा नहीं। दुनिया व आख़िरत से वाबस्ता मुस्लिमीन ए दौर हाज़िर के अक़ीदे,नज़रिए,रिवय्ये और ख़स़्लतें तबाह कर रहे इस अहम तरीन दीनी व मॊआश्रती बिगाड़ का पुख़्ता ह़ल #मुतवातिर दलील ए नुबूवत फ़र्मान ए रसूल स.है। क़वी उम्मीद है,उसकी ज़ेर ए नज़र तह़लील मुह़िब्बीन ए ख़ुदा ओ रसूल स۔,दीन ओ ईमान और ह़क़ ओ इंस़ाफ़ को इस रिवय्ये पे ग़ौर ओ फ़िक्र करने के लिए मुफ़ीद स़ाबित होगी।..... 

        रसूलुल्लाह हसनैन करीमैन रज़ि. के नाना जान स۔ने फ़र्माया:-

       ‌‌      मेरा यह बेटा सरदार है-उम्मीद है-अल्लाह ताला   
           इसके ज़रिए-दो मुसलमान गिरोह-मैं-स़ुलह़-कराएगा

                                       
ह़जरत इमाम ह़सन अ.नबी ए करीम स. की गोद में थे,ख़ास़ जुमे के दिन, जुमे की नमाज़ से ऄन क़ब्ल,ख़ुत्बे के दौरान या फ़ौरन बाद, तमाम स़ह़ाबा किराम रज़ि. खुत्बा पूरी तवज्जो और इन्हेमाक से समाअत कर रहे हैं,आप स. ऄन इस मौके पे पेश्गोई फ़र्माते हैं ताकि हर शख़्स ध्यान से सुन ले और ज़ेहन नशीं हो जाए;आवाज,अल्फ़ाज़ व रू ए मुबारक से बेटे की त़रफ़ मज़ीद मुतवज्जा करने की ख़ात़िर, कभी स़हाबा रज़ि. और कभी उनकी जानिब देखते हुए, इंतेहाई अहम बशारत का फ़र्मान ए एलान ए आम जारी करते हैं: - "#मेरा यह बेटा सरदार है۔۔۔"  किन का सरदार है? तमाम उम्मत ए मॊह़म्मदिया स. का ; हर मुसलमान का! जो भी आप स. को ब-रज़ा ओ रग़्बत ख़ातिमउन्नबिय्यीन मानता हो,जो भी अल्लाह,फ़रिश्तों, किताबों, अंबिया ओ रसल अ. व रोज़ ए हिसाब पे  ईमान रखता हो,जो भी मॊह़म्मद स. बिन अब्दुल्लाह बिन अब्दुल मुत्तलिब बिन हाशिम का दावेदार ए उम्मती हो। उन सब के सरदार सिब्त ए रसूल स. हज़रत इमाम हसन बिन अली अ. हैं। जिसने भी मॊह़म्मद स. बिन अब्दुल्ला... का दावा ए उम्मती करने के बावजूद,इस फ़र्मान को न माना,हज़रत इमाम हसन बिन अली अ. को अपना सरदार तस्लीम न किया,वह मॊह़म्मद स. बिन अब्दुल्ला... के ज़रिए ख़ुदा तआला के ह़ुक्म पर मुक़र्रर कर्दा सरदार बेटे को सरदार न मानने का ही मुर्तकिब नहीं हुआ,बल्कि अल्लाह ओ रसूल अ. के हुक्म से सरताबी करने का भी मुस्तौजिब क़रार पाया।पस,अज़ ख़ुद उसने रब्बुल आलमीन व रह़मतुल्लिआलमीन स. का दामन झिटक के छोड़ दिया। फ़र्मान ए रसूल स. में मख़्फ़ी शख़्स दलील ए नुबूवत स. के #पहले जुज़्व से ही #फ़ारिग़।.....

लेकिन ख़बर ए नबी ए करीम स. अभी काफ़ी है।आगे फ़र्माया:- "...#उम्मीद है....." आप स.ने उम्मीद लफ़्ज़ लुग़वी नहीं,यक़ीनी ख़बर के इस़्तेलाह़ी व मुरादी मानी में इस्तेमाल फ़र्माया है कि अंबिया ओ रसल अ. ह़ुक्म ए ख़ुदा से मुताल्लिक़ कभी ग़ैर यक़ीनी कलाम नहीं फ़र्माते।आप स. ने पेश्गोई ए स़ुलह़ इस लिए फ़र्माई कि आप स. को ख़ुदा तआला की त़रफ़ से मालुम था कि जिस शख़्स़ के मुस्तक़बिल में बात़िल स़ाबित होने के बावुजूद भी,बिना किसी ह़क़ और क़वानीन ए अद्ल ओ इंस़ाफ़ की ख़िलाफ़ वर्ज़ी कर के,जंग ओ जिदाल का त़ूफ़ान बर्पा करने की बिना पर, उसका ख़ब्स़ ए बात़िन दोबारा ज़ाहिर करने और एक मर्तबा फिर इम्तेहान से गुज़ारने की ख़ुदाई मंशा के पेश ए नज़र ((( इस से क़ब्ल जंग ए स़िफ़्फ़ीन में ह़ज़़रत अम्मार बिन यासिर रज़ि. के क़त्ल से मुताल्लिक़ दलील ए नुबूवत स.:- अफ़्सोस ! अम्मार! तुझे एक #बाग़ी गिरोह क़त्ल करेगा; तू उसे #जन्नत की त़रफ़ और वह तुझे #जहन्नम की त़रफ़ बुलाता होगा ))) स़ुलह़ की शर्तों पे मॊआहिदा होना है,वह रसूल ए ख़ुदा स. के उम्मत पे मुक़र्रर कर्दा सरदार बेटे को ख़ुदा व रसूल स. की ह़ुक्म उदूली कर के ना स़िर्फ़ अपना सरदार तस्लीम नहीं करेगा बल्कि तीर ओ तलवार ओ तफ़ंग, मक्र ओ फ़रेब और मक़्बूज़ा ह़ुकूमत के तमाम वसाइल के साथ मार्का ए क़त्ल ओ क़ताल पे उतर आएगा।((( जैसे,ख़लीफ़ा ए राशिद ह़ज़़रत अली के फ़रमान ए माज़ूली,आप करम अल्लाहु वुजुहल करीम को अमीर उल मौमिनीन मानने से इंकार और स़िफ़्फीन में मक्र ओ ख़ूं के दर्या बहाए,वग़ैरह ))) साथ ही क़ुर्आन की आयत-मौमिन स़ुलह़ की पेश्कश क़ुबूल करे,को मद्द ए नज़र रखके अपनी दानिस्त में बड़ी होशियारी भरी चाल चलेगा कि मेरा यह बेटा ह़ुक़्म ए ख़ुदा पे अमल करते हुए एक मुसलमान गिरोह की दूसरे से लाज़्मन स़ुलह़ कराएगा। दलील ए नुबूवत स. में मख़्फ़ी शख़्स ने नबी ए अकरम स. के कम ओ बेश 34 साल क़ब्ल (फ़तह़ मक्का से ढाई तीन साल पहले) हर मुसलमान का सरदार मुकर्रर किए गए आप स.के बेटे को अपना सरदार तो तस्लीम किया ही किया नहीं बल्कि फ़र्मान ए रसूल स. की ढिटाई से मज़ीद तौहीन करते हुए,(बज़ाहिर सिर्फ़) पूरी हुकूमत हथियाने की ख़त़िर मक्र ओ जंग का जाल बिछा दिया।मुआविया मै नास़्बीन #दूसरी मर्तबा फ़ारिग़।मज़ीद वज़ाह़़त ज़ेर ए " दो मुसलमान गिरोह ".....

एक बार फिर,ज़रूरत नहीं रह जाती कि फ़र्मान ए नबी ए करीम स. से मज़ीद गुफ़्त्गू की जाए,लेकिन कम अज़ कम इस पेश्गोई ए दलील नुबूवत स. से मुकम्मल त़ौर पे इस्तेफ़ादा करना लाज़िम है। आप स. ने दौरान या फ़ौरन बाद ख़ुत्बा ए जुमा,बरसर ए मिंबर,हज़रत इमाम ह़सन अ. के लिए एक और अज़ीमउश्शान बशारत का एलान फ़र्माया:- "۔۔۔#अल्लाह तआला इसके ज़रिए۔۔۔" किसके ज़रिए??? कौन???; नवासा ए रसूल स.ह़जरत इमाम ह़सन बिन अली अ., के ज़रिए रब्बुल आलमीन ! एक बार फिर ध्यान दिजिए! रब्बुल आलमीन !ह़जरत इमाम ह़सन बिन अली अ. के ज़रिए, ना कि ह़़जरत इमाम ह़सन अ. अज़ ख़ुद!!! आप स. के यह अल्फ़ाज़ ए इर्शाद ए गिरामी ह़ज़रत इमाम ह़सन अलैहिस्सलाम को रब्बुल आलमीन व आप स. का #नुमाइंदा मुक़र्रर करने का स़रीह़ एलान ए आम हैं!!!आप स. ने दलील ए नुबूवत के पहले जुज़्व से,ह़ज़रत इमाम ह़सन अ. को अपनी उम्मत का सरदार और इस तीसरे फ़र्मान ए गिरामी से अज़ीम फ़र्ज़ अदा करने के लिए #ख़ुदा व #अपना #नुमाइंदा मुक़र्रर फ़र्माया। ह़ज़़रत इमाम ह़सन अलैहिस्सलाम तमाम मुसलमानों समेत दोनों मुसलमान गिरोह के सरदार ए सरबुलंद और बजुज़ मर्तबा ए मक़ाम ए नुबूवत व रिसालत #आप स. के #जां नशीं #मिन जानिब रब्बुल आलमीन ठहरे।दलील ए नुबूवत फ़र्मान ए नबी ए करीम स. में मख़्फ़ी शख़्स मै नास़्बीन #तीसरी दफा फ़ारिग़ कि रब्बुल आलमीन व रह़मतुल्लिआलमीन स. के नुमाइंदे को उनका नुमाइंदा मानने से भी मुन्ह़रिफ़ हुआ।इधर,आप अलैहिस्कोसलाम को तीन त़रह़ से उम्मत ए मॊहम्मदिया स. पे एह़काम नाफ़िज़ करने के अख़्तियारात ह़ास़िल हुए।एक,बतौर नुमाइंदा ए अल्लाह ओ रसूल स.। दूसरे, मिल्लत ए इस्लामिया के सरदार ए सरबुलंद होने के नाते। तीसरे, उस वक्त जब 34/35 साल बाद,राह ए रास्त पे गामज़न मुसलमाननों की जमाअत ने आप अ.के दस्त ए मुबारक पे ख़लीफ़ा ए मुस्लिमीन होने पर बेअत की।..... 

नबी ए करीम स. आगे फ़र्माते हैं:-" ۔۔۔#दो मुसलमान गिरोह۔۔۔".एक वह जो अपनी मर्ज़ी और ख़ुशदिली से इस्लाम,उम्मत ए मोहम्मदिया, अद्ल ओ इंस़ाफ़,हिफ़ाज़त ए ख़िलाफ़त ए अला मिन्हाज ए नुबूवत, ह़क़ व ख़ुशनूदी ए ह़क़ तआला की ख़ात़िर,ह़ज़़रत इमाम ह़सन अ. को तमाम अख़्तियारात सुपुर्द कर के मिल्लत ए इस्लामिया का ख़लीफ़ा ए मुस्लिमीन बना कर मैदान में लाया।यह अज़ीम वाक़ेआ मशीयत ए क़ादिर ए मुत़्लक़ और उसके महबूब स.की पेश्गोई ज़ुहूर में आने की तम्हीद के त़ौर पे रू-नुमा हुआ।मुताल्लिक़ा दलील ए नुबूवत फ़र्मान ए रसूल स.:- ((( मेरे बाद ख़िलाफ़त तीस साल रहेगी; उस के बाद #कटखना-शाह आ जाएगा)))। दूसरा वह जिसे एक शख़्स़ ने बुग़्ज़ ए मौला करम. के पर्वर्दा नास़्बीन,मुनाफ़िक़ीन,तामे दौलत ओ हुकूमत, ऐश ओ इश्रत परस्त,मत़्लबी,ख़ौफ़ज़दा,ह़ब्ब ए बनू उमय्या के जाल में फंसाए गए,तमीज़ ए ह़क़ ओ बात़िल से क़ास़िर, मजबूर,कम समझ, ना-समझ और सादा लोह़ मुसलमानों को मुख़्तलिफ़ ह़र्बों, हथकंडों से वर्ग़ला कर एक गिरोह बनाया हुआ था।वह उसे नवासा ए नबी स. नुमाइंदा ए रब्बुल आलमीन व रह़मतुल्लिआलमीन ख़लिफ़ा ए मुस्लिमीन ह़ज़़रत इमाम ह़सन अलैहिस्सलाम को साथियों समेत क़त्ल करने के लिए हज़ारों ख़ूं आशाम नेज़े,तीर ओ तलवार ओ त़़बल,ज़र्हें, ख़ोद और घोड़े वग़ैरह दे कर मैदान में लाया।..... इल्ला नास्बीन= मुनाफ़क़ीन,(((फ़र्मान ए दलील ए नुबूवत स.:-ऐ अली तुझ से मोहब्बत नहीं करेगा मगर मौमिन और बुग़्ज़ नहीं रखेगा मगर मुनाफ़िक़!...मुनाफ़िक़ों...का ठिकाना जहन्नम है...अल्तौबा,73 ))) इस गिरोह के तमाम मुसलमान ख़व्हा किसी भी वजह से मुआविया के साथ हों,ब-हर त़ौर मुस्लमान थे,गुमराह किए गए, बद-गुमां किए गए,ललचाए या डराए गए ((( उन सब को ह़ज़़रत अली करम. ने मुआफ़ कर के उम्मीद ज़ाहिर की थी के रब्ब ए करीम उन्हें मुआफ़ फ़र्मा देगा ))) गिरोह में उनकी बड़ी भारी आक्सिर्यत थी। इतनी बड़ी कि सारे दुश्मन ए ख़ुदा ओ रसूल स., दीन ओ उम्मत और इंसानियत उन्हीं के पीछे छुपने को लाचार थे।बिल्कुल ऐसे ही जैसे आज मजबूर हैं और ख़ुद को " सुन्नी " बावर कराने की कोशिश करते हैं।.....

दलील ए नुबूवत स. का अगला लफ़्ज़ ए गिरामी है:- "۔۔۔#में۔۔۔", ध्यान दिजिए ! " #मैं " ;  " से " नहींं ! ह़ज़रत इमाम ह़सन अ. नुमाइंदा ए अल्लाह ओ रसूल स. के साथ पूरी उम्मत ए मोह़म्मदिया स. के सरदार ए सरबुलंद भी हैं। जिस के अफ़्र्राद दो गिरोह में तक़्सीम हों,तीन,चार या ज़्यादा। एक गिरोह के ख़ुद साख़्ता सरगिरोह ने सालों से मसला पैदा किया हुआ था जिसे राह ए रास्त पे गामज़न दूसरा गिरोह ह़ल करना चाहता था, इसलिए आप अ. ने दोनों #में #स़ुलह़  #कराई, न कि ख़ुद किसी " से की " ।मुआविया मै नास़्बीन चौथी मर्तबा फ़ारिग़। बिलफ़र्ज़ अगर,मुदाफ़े मख़्फ़ी शख़्स़ कहे कि नुमाइंदा ए रब्बुल आलमीन व रह़मतुल्लिआलमीन स. ने " स़ुल़ह़ की " तो मख़्फ़ी शख़्स़ पांचवीं दफ़ा फ़ारिग़ ((( मगर जैसे कि दलील ए नुबूवत स.से इयां है,आप रज़ि. ने किसी से भी स़ुलह़ नहीं की ))) कि आप स. का एक और फ़र्मान ए आलीशान है:-((( मेरी,मेरे अहल ए बैत से जंग करने वाले से जंग है और स़ुलह़ करने वाले से स़ुलह़ ))) यानी आप अ. से जंग करने वाला भी काफ़िर और स़ुलह़ करने वाला भी। जैसे मक्के के मुश्रिकों व काफ़िरों ने आप स. से जंग की तब भी काफ़िर और स़ुलह़ की तब भी काफ़िर।यमन,नजरान के ईसाई वफ़द ने ईमान न लाकर जज़िया देने की शर्त पे मॊआहिदा करके स़ुलह़ की तब भी।.....

बशारत ए दलील ए नुबूवत स. का अगला लफ़्ज़ ए गिरामी है:-''.....#स़ुलह़.."।यह लफ़्ज़ नबी ए करीम स. की इस पेश्गोई की अहमियत के एतबार से अपनी जगह इतना अहम है कि इसके जलू में किताब की मुताद्दिद जिलदें समा जाएं।लिखने वाले को अब्द मुनाफ़ के बेटों से शुरू करके अल्लाह तआला के स़ुलह़ से मुताल्लिक़ मन्शा ओ मक़ासिद और आख़री फ़ैसले तक के मुम्किना व गुज़िश्ता वाक़ेआत, अस़्रात, अमल,रद्द ए अमल, नताइज,किरदारों की जिबल्लतें,रिवायतें,मन्स़ूबे,इहद्दाफ़ ओ मक़ास़िद का तमाम पहलूओं से बिला रू रिआयत जाइज़ा व तज्ज़िया करते हुए जिल्दों पे जिल्दें क़लमबंद करनी होंगी।सो,फ़क़्त़ चंद बातें।यह आलम ए इंसानियत की ऐसी फ़क़ीदुल-मिस़ाल ((( इस लिए कि नुमाइंदा ए अल्लाह ओ रसूल स.;  मुख़ालिफ़ गिरोह के ख़ुद साख़्ता सरगिरोह को चंद शराइत़ के काग़ज़ी वादे पे सब कुछ सपुर्द करदे और मुसलमानों की रियासत में से मुत़्लक़ कोई अद्ना सी शै भी अपने पास न रखे ! मिस़्ल ए ख़र्क़ ए आदत ह़ैरत ओ इस्तेजाब का मक़ाम है !!!!! ))) स़ुलह़ थी कि मा-क़ब्ल ओ बाद कभी कहीं हुई न होगी। बिल्कुल मक़्तल ए कर्बल की तरह़ बेमिस़्ल मगर साथ ही क़त्अन बर-अक्स! नताइज दोनों के यक्सां ! स़ुलह़ की शराइत़ के ख़िलाफ़ अमल करने वाले की नियत ओ ज़ेहनियत के अक्कास एमाल ओ अक़्वाल ओ अस़्रात ओ नताइज फ़ैसला स़ादिर करते हैं:- फ़ित्ना वक़्ती त़ौर पे ख़त्म हुआ और दीन ओ उम्मत में दाइमी तिफ़र्क़ा डाल दिया गया ((( जैसे,सिफ़्फ़ीन में क़ुरआन नेज़ों की नौक पे चढ़ा के डाला और नबी ए करीम स. की ख़वारिज से मुताल्लिक़ पैश्गोई के ज़ुहूर का सबब हआ )) .....!  ऐसे तनाज़ात में स़ुलह़,अमूमन तीन त़रह़ की होती हैं। एक,ग़ालिब फ़रीक़ मग़्लूब फ़रीक़ पे शर्तें थोपता है। यहां ऐसा हर्गिज़ नहीं।दो,फ़र्रिक़ैन कुछ ले दे कर स़ुलह़ करते हैं। यह भी क़त़्अन नहीं हुआ।तीन,मक्कार फ़रीक़ जो चाहता है लेने के लिए फ़रीक़ मुख़ालिफ़ की हर शर्त़ क़ुबूल कर लेता है। बिल्कुल यही किया गया،लेकिन ह़ज़रत इमाम ह़सन अ. की निस्बत से ब-वजह अदीमुल- मिस़ाल स़ुलह़ होने के मुक़ाबिल इसकी अहमियत कम कम है; और दलील ए नुबूवत स. में मख़्फ़ी शख़्स़ के ताल्लुक़ से इंतेहाई शदीद एताब आमेज़.....! चुंकि ह़ज़रत इमाम ह़सन आ. रसूल अल्लाह स. के नवासे,जां नशीं मिन जानिब अल्लाह तआला इल्ला नुबूवत ओ रिसालत, तालीम तर्बियत, दुआओं वह फ़ैज़ान याफ़्ता ( दूसरी त़रफ़ !!!) सो आप अ. को ब-वास्ता नबी ए करीम स. मौस़ूल हुक्म ए ख़ुदा पे अमल करना ही करना था। इसी लिए आप अ. ने राह ए रास्त पे गामज़न जमाअत की त़रफ़ से ऐसी ((( ख़व्हा अल्लाह तआला ने आप अ.पे इल्क़ा की हों या मौला अली करम.ने नबी ए करीम स. से मौस़ूला अमानत का मज्मुआ आप अ. को पुहंंचाया हो ))) शर्तें मनवाईं जिन्हें आप अ. ख़ूब अच्छी त़रह़ जानते थे कि वह सारी तस्लीम कर लेगा,मगर अमल बर-अक्स करेगा। यूं उसके सारे बोहतान, सारे बहाने,सारे मुत़ाल्बे,सारे वादे,सारे इरादे त़श्त अज़ बाम हो जाएंगे.....! एक अहम बात यह कि स़ुलह़ बिना मॊआहिदा लिखे और मॊआहिदे में बिना शर्त़ दर्ज किए,हर्गिज़ स़ुलह़ नहीं होती !!!.....

फ़र्मान ए पेश्गोई ए दलील ए नुबूवत स. का आख़री जुज़्व ए गिरामी है:-".....#कराए-गा "। स़ुलह़ कराए-गा। #कराए पे ख़ुस़ूस़ी तव्वजो मर्कूज़ किजिए ! #कराए-गा ; #करे-गा नहीं। #स़ुलह़ #कौन #कराए-गा ???  #रब्बुल आलमीन। #किस #के #ज़रिए #कराए-गा ???  #नवासा ए रसूल स. #ह़सन बिन अली अ. #के #ज़रिए #कराए-गा। #कौन? #किस? #के #ज़रिए #किन?#की #स़ुलह़ #कराए-गा ? #रब्बुल आलमीन #अपने व #अपने #मह़बूब स.#के #नुमाइंदे ह़ज़रत इमाम #ह़सन अ.#के #ज़रिए #दो मुसलमान गिरोह #में #स़ुलह़ #कराए-गा जो बह़ुक्म ए ख़ुदा नबी ए करीम स. के मुक़र्रर कर्दा हर उम्मती के सरदार ए सरबुलंद भी हैं।मुआविया मै नास़्बीन पांचवीं मर्तबा फ़ारिग़। ह़ज़रत इमाम ह़सन अ.श. ने #रब्बुल आलमीन के #क़ुर्आन व आप स. से मौस़ूल ह़ुक्म पर #बत़ौर #उनके #नुमाइंदे #दो मुसलमान गिरोह #में #स़ुलह़ #कराई #ना कि #ख़ुद #किसी #से #की।۔۔۔۔۔

नबी ए अकरम स. ने बह़ुक्म ए ख़ुदा अव्वलीन अल्फ़ाज़ ए पेश्गोई ए दलील ए नुबूवत से ह़ज़रत इमाम ह़सन अ. को अपने हर उम्मती का सरदार मुक़र्रर फ़र्माया। फिर उन्हें अपने बाद 30 साल पूरे होने से पहले ही एक शख़्स़ के 6 बरस से ख़ुदा की ज़मीन पे फैलाए जा रहे फ़ित्ना ओ फ़साद को मज़ीद फैलाने से रुकवाने,बर्पा की जा रही ख़ाना जंगी और बद-अम्नी ख़त्म कराने, ब-शुमूल बंदगान ए ख़ुदा उम्मत के जान ओ माल ओ इज़्ज़त ओ ह़ुर्मत मह़फ़ूज़ रखवाने और दोबारह ((( पहले, क़त्ल ए ह़ज़रत अम्मार बिन यासिर रज़ि. व बाग़ी गिरोह की पेश्गोई ए दलील ए नुबूवत स. के ज़रिए))) इम्तेहान में पड़े उसी शख़्स़ का एक बार फिर ख़ब्स़ ए बात़िन ज़ाहिर कराने के लिए अल्लाह तआला व अपना #नुमाइंदा मुक़र्रर फ़र्माया।यह इस क़दर अज़ीमुलमर्तबत ज़िम्मेदारी थी कि नवासा ए रसूल स. ह़ज़रत इमाम ह़सन बिन अली अ. ही सर अंजाम दे सकते थे। जैसे उनके वालिद मौला अली करम.को मक्के के मुश्रिकों व काफ़िरों की,अपने पास रखी हुई अमानतें, सपुर्द कराने के लिए,रवानगी ए शब ए हिजरत, बिस्तर ए नुबूवत पे सुलाया। महीनों बाद अज़ फ़तह़ मक्का,ह़ज के मौक़े पे,मुश्रिकीन ओ कुफ़्फ़ार के लिए नाज़िल ह़त्तमी हुक्म ऐ ख़ुदा सुनाने मक्के भेजा;और बद्र ओ उह़द ओ ख़ंदक़ ओ ख़ैबर वग़ैरह में अज़ीम ज़िम्मेदारियांं अत़ा की थीं।۔۔۔۔۔

रोज़ ए रोशन की त़रह़ वाज़ेह़ है कि ह़ज़रत इमाम ह़सन अ. ने किसी से भी क़त़्अन स़ुलह़ नहीं की। रब्बुल आलमीन ने अपने व अपने रसूल स. के नुमाइंदे(के ज़रिए),मै सारी उम्मत ए मॊह़म्मदिया स. दोनों मुसलमान गिरोह के सरदार ए सरबुलंद और राह ए रास्त पे गामज़न जमाअत के उन को सपुर्द कर्दा अख़्तियारात के तह़त मिन जानिब कुल,शामिल ए तनाज़ा " दो मुसलमान गिरोह  में  स़ुलह़ कराई।" गुमराह कर्दा शामी गिरोह को सब कुछ तहस नहस करने व क़त्ल ओ ग़ारत-गरी पे कमर बस्ता कर दिया गया था।उसे बाईस बरस से जमा करने वाले सरगिरोह ने मक्र ओ फ़रेब ओ लालच के नर्ग़े में फंसाकर अपने पीछे पूरी त़रह़ लामबंद किया हुआ था। सो,आप अ. ने ख़ुदा ओ रसूल स. और राह ए रास्त पे गामज़न मुसलमान गिरोह की त़रफ़ से,गुमराह कर्दा मुसलमान गिरोह के ख़ुद साख़्ता सरगिरोह बने शख़्स़ को,चंद साल के लिए मुसलमानों की रियासत के इंतेज़ामी उमूर सपुर्द कर दिए।उस पे मज़ीद शरई ह़ुज्जत तमाम करने के लिए मॊआहिदा ए स़ुलह़ में शर्तें मनवा के लिखवा दीं।इस आख़री व तीसरे इम्तेहान में भी #नुमाइंदा ए ख़ुदा ओ रसूल स. के मुक़ाबले पे आया शख़्स़ पूरी त़रह़ नाकाम हो गया। ((( इस से क़ब्ल सिफ़्फ़ीन में ह़ज़रत अम्मार  रज़ि. के क़त्ल की ख़बर मौस़ूल होने पर फ़र्मान ए दलील ए नुबूवत स. के मानी उलट के आप स. को ह़ज़़रत हम्ज़ा रज़ि. और ह़ज़रत अली करम.को ह़ज़रत अम्मार रज़ि. के क़ातिल व ۔۔۔(नऊज़ुबिल्लाह) क़रार दिया और छ 6 माह बाद बमक़ाम अज़्रज (اذرج) मै  कलाम-उल्लाह, ख़लीफ़ा ए राशिद,1000 बद्री व अस़ह़ाब ए रिज़वान रज़ि.और तमाम उम्मत ए मोह़म्मदिया स. के साथ ऐसा ही किया )))। मुआविया मै नास़्बीन #छटी दफ़ा फ़ारिग़। मॊआहिदे की शराइत़ के बर-अक्स अमल करने से उसका अस़्ल मक़सद व चेहरा एक बार फिर अलीम ओ ख़बीर ओ बस़ीर रब्ब समेत करोड़ों मुस्लिमीन और पूरी नौ ए इंसानी के सामने आ गया,ताकि रोज़ ए ह़िसाब करोड़ हा करोड़ अल्लाह के बंदे उसके ख़िलाफ़ गवाही दे सकें। इस एक ही दलील ए नुबूवत फ़र्मान ए रसूल स., में मख़्फ़ी शख़्स़ छ 6 मर्तबा फ़ारिग़ है। दोनों फ़रीक़ में स़ुलह़ का मॊआहिदा कराना और राह रास्त पे गामज़न जमाअत की जानिब से मॊआहिदे की शराइत़ त़ै करना भी दलील ए नुबूवत फ़र्मान ए नबी ए करीम स,. व इस जमाअत के आप अ. को सुपुर्द कर्दा अख़्तियारात के तह़त आप अ. की ज़िम्मेदारी में दाख़िल था। ख़ुदा व मह़बूब ए ख़ुदा स. के नुमाइंदे नवासा ए रह़मतुल्लिआलमीन स. बिन अली अ. के मुक़ाबले पे सरगिरोह ए नास़्बीन आया,यह उसकी तालीम ओ तर्बियत व हविस ए इक़्तेदार पे तुर्रा मै आप स. अहल ए बैत ए अत़्हार अ. से बुग़्ज़ की मार,कोई और आता,तब भी ह़ज़रत इमाम ह़सन अलैहिस्सलाम की #सरदारी, #ज़िम्मेदारी व #नुमाइंदगी ए ख़ुदा ओ रसूल स۔की क़द्र ओ मन्ज़िलत यही होती।۔۔۔۔۔

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नोट: तह़रीर में पांच पेश्गोई ए दलील ए नुबूवत फ़र्मान रसूल स. पेश किए गए हैं।एक जानिब सब का ताल्लुक़़ रास्त बिर्रास्त मुश्तर्का त़ौर पे अहल ए बैत ए अत़्हार अ. व तीन अलग अलग बर्गज़ीदा हस्तियों और दो-त़र्फ़ा जुदा जुदा मवाक़े से है; यानी आप स. ने दस साला दौर ए हिज्रत के मुख़्तलिफ़ औक़ात में मौक़े बमौक़े,कम ओ बेश 34 ता 40 बरस बाद,मुतफ़र्रिक़ मौकों पर,सानेह़ात ओ वाक़ेआत ग़ैर मुश्तबा रूनुमा होने के बारे में,यह पेश्गोईयां इर्शाद फ़र्माईं; दूसरी त़रफ़ तमाम मतून में फ़र्द ए वाह़िद अख़्ख़स़-उल-ख़ास़ निशाना मख़्फ़ी शख़्स़ " मुआविया " है। इंतेहाई तवज्जो त़लब,ह़ैरत ओ फ़िक्र अंगेज बात यह कि आप स. ने किसी एक पेश्गोई में भी उसका नाम लेना भी गवारा नहीं फ़र्माया!!!!! यहां तक कि एक में उसकी ख़स़्लत को पूरी त़रह़ उभार के नुमायां किया और साथ ही नाम लेने से भी सख़्त एराज़ फ़र्माया। इसी सीरत ओ सुन्नत ए रसूल स. पे अमल करते हुए,मज़मून में कोशिश की गई है कि आप स. और ह़ज़रत इमाम ह़सन अ. के अस्मा ए मुबारिका के साथ एक ही जुम्ले में उसका नाम न आए।अगर कहीं भूल चुक से आ गया हो,बहुत बहुत माज़रत ! मुत्तले फ़र्माएं ! ताकि तस्ह़ीह़ कर दी जाए।۔۔۔۔۔

बहुत शुक्रिया-अलमिहर ख़ां

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